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Monday, July 5, 2010

दिल उदास है

दिल उदास है बहुत कोई पैगाम ही लिख दो
तुम अपना नाम न लिखो, "गुमनाम" ही लिख दो .....
 [ पैगाम = Mail ]
मेरी किस्मत में ग़म-इ-तन्हाई है लेकिन
तमाम  उम्र न लिखो मगर एक शाम ही लिख दो .....

ज़रूरी नहीं  है की मिल जाये सुकून हर किसी को 
सरे-इ-बज़्म न आओ मगर बेनाम ही लिख दो ......

ये जानता हूँ की उम्र भर तनहा मुझको रहना है
मगर पल दो पल, घडी-दो-घडी मेरे नाम ही लिख दो .......

चलो हम मान लेते हैं के सजा के मुस्ताहिक़ ठहरे हम 
कोई इनाम  न लिखो, कोई इलज़ाम ही लिख दो ......
[ मुस्ताहिक  = Deserver ]

 

4 comments:

Shruti said...

Bahut khub. Very well composed. Par kuch kuch words nai samajh aaye. Ye 'sare-e-bazm' ka matlab samjhayenge aap ?

MangoManBunty said...

Bhaaai!!!! The last line was exceptional!!! Awesome nazm!! Read it thrice!

Mukesh said...

@shruti: Thanks.
Ohh, I forgot to mention about the word 'sare-e-bazm'. Actually it means 'visible to all'.

Mukesh said...

@mangoman: Thanks bhai. Glad to know that u had given a lot of time to read it thrice.
BTW the last line is my favourite too.

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Drop in a few words. It brings smile on my face.